Wednesday, July 5, 2017

सूफ़ी पात

दरवेश से होते है पत्ते
यहां वहां बिचरते हुये
बेनियाज़
शाखों पर लगे ये करते हैं जुहद
अतीत के गुम ये यायावर
निकल आते है
कच्ची दीवारों पुराने खंडहरों से
और पहुंच जाते है सर्द रातों में
दहकते आवा में
इंतजार करते लोगो को
देते है दिलासा और करते है गर्म रिश्तों को
इनके दिल पर जो लकीरें है
दरअसल ये युगों की कविता है
बंद डायरी के बीच बैठे
ये सुनाते है किस्से
तेरे मेरे प्रेम के
ये दरवेश है तो कहां ठहरेंगे
चल देते है किसी और
पगडंडी पर
जहां प्रतीक्षा की पंक्तियां
गुनगुनाता प्रेम
इन्हें भर लेता है बाहों में
कहानी सुनने को
शुरू होती है
एक और नई कहानी....।

(बेनियाज़-- किसी भी चीज़ की चाह न होना।
जुहद-- तपस्या )


Saturday, July 1, 2017

अहसासों की बारिश

स्फटिक की छत कुछ देर पहले की बारिश से धुल कर किसी नायिका की हीरे की लौंग सी चमक रही है । छत के कोने पर रातरानी की डाल जैसे चूमना चाहती है उन सफेद लिहाफ को जो आधे खुले पडे है। अभी अभी हवा के हल्के झोके से लिहाफ का आंचल रातरानी ने भर दिया है। ऊपर अंबर में बड़े से बादलो के समूह से एक छोटी बदली अभी अभी अलग हो चंदा को अपने आगोश में लेकर अपनी स्मित मुस्कान फेक धरती पर दूर कही किसी घर की छत पर बैठी नायिका की हया को आड़ दे रही है ।
एक सरसराहट सी हुई है रेशमी आँचल किसी की सांसो से हिला है चकित नयनों ने ऊपर उठने की हिमाकत अभी की ही थी कि पास के बरगद पर किसी पंक्षी ने ख़ामोशी को सुर दिये है और अनजाने में ही नायिका की दिल की धडकनों को बढ़ा दिया है शायद मंद समीर ने नायिका की घबरहाट को भांप लिया है और उसने हल्के से डोल कर पास बैठे अहसासों को मंजू सुरभि थमा कर अपनी रहा ली है थमने थामने के क्रम में नायिका की नथनी हिली है तो पास हिला है एक दिल। 
दूर इंजन ने सीटी दी है । कुछ सांसो की खुश्बू चाँद की चांदनी और पांव की झांझर बजी है ।
रुन झुन से अहसास ले रेल न जाने कितने अंजाने कस्बे गाँव नदी खेत मकानों को पार करते हुये आखिर पहुंच ही जाएगी जहां उसका गंतव्य होगा....जाओ कोई तो है जो तुम्हारा इंतजार करता है।