Monday, February 12, 2018

कविता का दिक्‌ काल

कुछ ठेके पर उठी कविताएं
अपने आप पर रश्क़ कर सकती है उनके मालिक कुछ ख़ास किस्म के होते है। दुनिया उन्हें सलाम करती है।
वैसे सजदा करते उनकी भी उम्र बीत रही है।

कुछ इतनी खुशकिस्मत नहीं
वो फुटपाथ पर ही जन्म लेकर वही मर जाती है हालाँकि मुझे ख़ुशी है कि वो उनकी तरह नहीं जिनकी रूह तक बजबजा रही है ।

ऐसी कविताएं अक्सर नज़र आ जाती है जो प्रेम को याद करती है बार-बार और फिर आहे भरती है हालाँकि प्रेम को फ़ना हुए एक युग बीत गया

कुछ कविताएं ऐसी जादू की टोपी पहनातीे है बस एक हाथ हिलाया और तमाम नामजद पुरस्कार उनकी जादू के झोली में।

इंसानी हांथों में बिछी दरारों की तरह कुछ कविताएं हर उस दरार में घुस झांकती है जिसमे वर्षो से थकी रूह सांस लेना भी भूलती जा रही है।

नतीजा दरारों में ही दम तोड़ती है

कुछ तो अजीब अहमक (लोग उन्हें ऐसा ही कहते है) किस्म की कविताएं है कभी -कभी अपनी धौंकनी सी सांसों से तमाम अंगारे गिराती है, और उन पर अपने फूंक का मंतर मार-मार कर दफन हुई बातों को जिन्दा करने की कोशिश करती है ,क्योंकि उन्हें लगता है कुछ बातें दफन नहीं हुई जबरदस्ती जिन्दा दफना दी गई है।

कुछ कविताओं का ये भी शौक भी है वो कब्र खोद दुर्घटनाओं को निकालती और घटना बना लोगो के बीच सनसनी फैला कर चर्चा में रहना चाहती है ।

लेकिन एक दर्द है एक कविता का (जब दर्द गहरा हो तो प्रश्न बन जाता है )वो ये कि जब सब कविता है तो वो साथ क्यों नहीं ?

वैसे ये समय क्या है ? कविता का लोकतंत्र, भेड़तंत्र, तानाशाही या तमगाशाही ?
जो भी हो कुछ कविताएं सर को उठाए न्याय मांग रही है.... मिलेगा क्या?

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Tuesday, January 30, 2018

घनघोर अंधेरे में

घनघोर अंधेरे में जो दिखती है,
वो उम्मीद है जीवन की

हिंसक आस्थाओं के दौर में प्रार्थनाएं डूब रही है
अन्धकार के शब्द कुत्तों की तरह गुर्राते
भेड़ियों की तरह झपट रहे है
उनकी लार से बहते शब्द
लोग बटोर रहे है उगलने को

जर्जर जीवन के पथ पर पीड़ा के यात्री
टिमटिमाती उम्मीद को देखते है
सौहार्द्र के स्तंभ से क्या कभी किरणें फूटेंगी

उधेड़बुन में फँसा बचपन
अँधेरे  की चौखट पर ठिठका अपनी उँगली से
मद्धिम आलोक का वृत खींचना चाहता है

एक कवि समय की नदी में
कलम का दिया बना कविताओं का दीपदान कर रहा है।
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#यहदेशहैवीरजवानोंका
कैसे -कैसे सपन सँजोय,
टुकड़ा-टुकड़ा गगन समोय।

Saturday, January 27, 2018

सागर लहरी सा प्रेम

ले चल मुझे भुलावा दे कर मेरे नाविक धीरे-धीरे
जिस निर्जन में सागर लहरी, अम्बर के कानों में गहरी
निश्चल प्रेम कथा कहती हो तज कोलाहल की अवनि रे”
( जयशंकर प्रसाद) कभी कभी नाविक अकेला ही सागर पार किसी अनजाने गांव का दरवाजा खटखटा देता है💕❤🍁

किसी अनजाने गाँव में
अनजाने घर की कभी न कभी
सांकल खटकती ही है
खिड़की खुलती है तो शुरू होती है 
दास्ताने उल्फ़त
आँखों एहसास करती है दिल एतबार करता है
फिर दोनों का
न होने से टकराता है
शायद रूह ने साथ छोड़ा है जिस्म का
शुरू होता है रतजगा
ठिठुरी लम्बी रातों का
कहानी आगे बड़ती है
एक तारे की सिसकी 
ध्यान की कश्ती से दरिया पार करती है
उल्फ़त के तराने गूंजते है
साहिबान की दास्तान
अंगड़ाई लेती है 
चनाब से गंगा तक
फूलता है झरता है
महुआ घटवारिन के 
किस्से सा प्रेम
सदियों से बहता है।
💗💕

💟प्रेम आदि न अंत ,हज़ारों ख़्वाहिशें पे दम ।


Friday, December 29, 2017

एक था सरवन

एक था सरवन
पालकी उठाता था
जेठ की लू में
पूस के जाड़े में
गीत गाता था
चैता सुनाता था

सरवन की पालकी में
ठहर गया एक दिन
चुलबुला वसंत
प्रीत कुसुंभ के संग

फिर प्रेम रंगा, फागुन रंगा
रंग गया वसंत
प्रीत कुसुंभ के संग

अब पग फेरा नहीं
वसंत ठहरा वही

इतिहास हुआ क्रुद्ध
मौसम हुआ रुद्ध

इतिहास देवता कहते है..

सरवन सीधा नहीं बदमाश था
वो तो चालबाज था
वो चोर है
वो पागल है
वो कायर है

सरकार ने सामाजिक स्तरीकरण की बात की
सरवन को मात दी
सरवन सरकार के पाँव पखारता है
माई बाप, माई बाप चिल्लाता है

साल आते है चले जाते है
हर युग में सरवन गाते फिर रोते है
बस यूं ही अपना वसंत खोते है

पालकी उठाएगा नहीं
चैता सुनाएगा नहीं
सरवन अब कभी नज़र आएगा नहीं

एक है पागल
विगत पालो की पालकी उठता है
चैता गाता है-

चढ़त चइत चित लागे ना रामा
बाबा के भवनवा
बीर बमनवा सगुन बिचारो
कब होइहैं पिया से मिलनवा हो रामा
चढ़ल चइत चित लागे ना रामा...

वसंत की कब्र पर बंदिशें बिखर बिखर जाती है

सरवन मरते नहीं
वसंती अंधेड़ों में अदृश्य हो जाते है।

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Saturday, December 16, 2017

न्याय की आस्थाएं

उसकी पीठ पर बैजनी फूल बंधे थे 
और हाथ में सपने 
अभी अभी उगे पंख 
उसने करीने से सजा रखे थे 
कुछ जुगनू उसके होठों पर चिपके थे 
कुछ हँसी बन आसमान में

वो एक सर्द रात थी 
जब हम नक्षत्रों के नीचे चल रहे थे 
और चाँद मेरे साथ 
हिम खंड के पिघलने तक 
मैं उसका साथ चाहता था 
उसे भी इंतजार था सुनहरी धूप का

मैं भरना चाहता था 
वो समेटना 
इसलिए हमने एकांत का 
इंतजार किया

उसकी हँसी एकांत को भर रही थी
मैं डूब रहा था
तभी एकांत के अधेरों में छिपे भेड़ियों ने 
उसकी हँसी को भेदना शुरू कर दिया 
मैं अकेला ,उनके साथ उनकी हैवानियत
हैवानियत से मेरी नियत हार गई 
और हँसी भी

क्षत विक्षित हँसी अब झाड़ियों में पड़ी थी 
और में न्याय में
न्याय उलझा था किसी नियम से
मैं आज भी अधेरी रात के डर को 
मुट्टी भर राख और चुल्लू भर आंसू में मिला कर
न्याय की आस्थाएं ढूंढ़ रहा हूं।
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